

रायगढ़ की साहित्य की उर्वरा धरती पहले भी कई मूर्धन्य साहित्यकारों से पुष्पित पल्लवित होकर क्षेत्र का नाम आलोकित करती रही है । एक छोटे से पौधे के रूप में अंकुरित होकर विशाल वृक्ष का स्वरूप प्राप्त कर प्रदेश व देश को साहित्यिक ठंडी बयार सा नवजीवन देते रहे हैं । इन पुष्पों की सुगंध से वातावरण खुशबुओं से सराबोर होता रहता है साहित्यकारों के रूप में श्री मुकुटधर पांडे, श्री बलदेव साव, जन कवि श्री आनंदी सहाय शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी विशिष्ट हैं। जिन्होंने रायगढ़ के नाम को देश के साहित्यिक जगत में प्रमुखता से रेखांकित किया है । दूसरी पीढ़ी के साहित्यकारों में एक नाम तेज़ी व प्रमुखता से उभर रहा है वह नाम है अकरम ख़ान का ।
अकरम एक सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी हैं। सीधा सादा व्यवहार, चेहरे पर अठखेलियाँ करती मुस्कान। वाणी में शहद सी मिठास। अकरम के बारे में यह बाद सटीक लगती है कि
हम तो फूलों की तरह अपनी आदत से मजबूर हैं
तोड़ने वाले को भी ख़ुशबू की सजा देते हैं ।
वे सबके मान सम्मान का पूरा ध्यान रखते हैं । मैंने उन्हें कभी भी किसी से ऊंची आवाज़ में बात करते नहीं देखा –
हमने सूरज की रोशनी मैं भी अदब नहीं खोया,
कुछ लोग तो जुगनू की चमक से मग़रूर हो गए ।
जो हाथ बैडमिंटन कि रैकेट थाम कर चपलता व शक्ति से प्रहार कर विपक्षी को धूल चटाने का सामर्थ रखते हैं जिसका सब कुछ सिर्फ़ बैडमिंटन है।जिसने इस खेल में न केवल शहर बल्कि प्रदेश का नाम अपने खेल के गुणवत्ता एवं कोचिंग के कारण रोशन किया है।उसने अपने खेल में प्रसिद्धि पाने के बाद कालांतर में शहर व समाज को कुछ वापस करने की मंशा से स्वयं को गुरु द्रोणाचार्य के रूप में प्रस्तुत किया। अर्थात उसने यहाँ के नौनिहालों के मन में बैडमिंटन खेल के प्रति रुचि जागृत कर उनके हाथों में रैकेट थमाया इनहे खेल के मैदान में पसीना बहाने के लिए प्रेरित किया । और इन नौ रत्नों को तराशकर क़ीमती रत्न बनाया उस शख़्सियत का नाम है अकरम ख़ान ।
अपनी रायगढ़ पदस्थापना के दौरान मैं अकरम के संपर्क में आया।मैं भी वही बैडमिंटन खेलने जाता था जहाँ अकरम जाते हैं ।वहीं से ये मित्रता बनी।मैं उनके व्यक्तित्व को इन लाइनों में बयान करना चाहूंगा कि “न जानें कौन सी दौलत हैं कुछ लोगों की नज़रों में,बात करते हैं तो दिल ख़रीद लेते हैं।” मुझे पता ही नहीं चला कि जिन हाथों में कभी रैकेट था उन हाथों में नाज़ुक क़लम ने अपना घर बना लिया। जब मैंने उनकी पहली रचना पहली बार पढ़ी तभी मुझे लगा कि अकरम को सरस्वती का भरपूर आशीर्वाद है। इनकी लेखनी भी इन्हें वैसी ही प्रसिद्ध करेगी जैसे बैडमिंटन के रैकेट ने किया है। खेल व लेखन का अद्भुत संगम है अकरम के व्यक्तित्व में।
इनके लेखन में गहराई परिलक्षित होती है समाज में दिखने वाली अशांति के प्रति उनका लेखक मन पीढ़ा से भर जाता है।कुछ करने का मन अकुलाता है है छटपटाता है । कोई हाल तलाशता है । इनकी लेखनी सच के साथ रहती हैं । जो देखते हैं वही लिखते हैं, लफ्जों की दग़ाबाज़ी हमसे नहीं होती । इनका लेखक मन ज़िंदगी से सुलह करना चाहता है । “ कोई सुलह करा दे ज़िंदगी की उलझनों से, बड़ी तलब लगी है मुस्कुराने की । “ स्वयं को खिलाड़ी से लेखक में परिवर्तित करना बेहद कठिन कार्य है । क्योंकि दोनों पृथक पृथक कार्य क्षेत्र है। बैडमिंटन के कठोर रैकेट से प्रहार पर प्रहार करते हुये सामने वाले खिलाडी को पस्त कर देने वाले हाथ कोमल सी कलम थाम कर शब्दों का ताना बाना बुन कर भावों को प्रगट करने की क्षमता सभी में नही आ पाती है। मगर इस दुरूह कार्य को रायगढ़ शहर के बैडमिंटन खिलाडी अकरम खान ने कर दिखाया है। वे बैडमिंटन खेलते खेलते कालान्तर में शब्दों के शिल्पकार बन गये ।
शायद उनका कवित्व क्षमता कहीं सुसुप्त अवस्था में मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी थी। वह मन जब थोडा जागृत हुआ तो उसने अपने आसपास चारों ओर अव्यवस्था, अशान्ति, बैर झूठ, फरेब, पशुता देखी। यह सब देख कवि अकरम का कोमल मन व्याकुल हो गया। छटपटाहट से भर गया। कवि भावों से परिपूर्ण समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझने लगा। उनका मन उनसे बातें करते हुये कहने लगा कि यदि उन उत्तरदायित्व का निर्वहन समय पर नही किया तो विलम्ब हो जायेगा, तथा मानवी स्थिति और भी बिगड़ सकती है। यह सोच उन्हें समाधान तलाशने को बार बार झकझोरती रही। यह मानव पथ उसी तलाश का परिणाम है। समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार के अंधेरों में मानव पथ एक प्रकाश पुंज की तरह है जो सम्पूर्ण अंधकार पूर्ण पथ को आलोकित करने की क्षमता रखता है। कवि हालाकि सम्पूर्ण राजपथ को आलोकित करने की बात नहीं कहता। मगर उसका मत है कि यदि उसके प्रयास से एक पगडंडी भी प्रकाशयुक्त हो सकी तो यही उसकी सफलता होगी।
मानव पथ को कवि अकरम खान मे मुख्यत तीन भागों में बांटा है। बाल्यवस्था, किशोरास्था व युवावस्था। जीवन की इन अवस्थाओं को उन्होंने अपने तरीक़े से परिभाषित किया है ।
कवि बाल्यावस्था
शिशु रूप चन्द्रमा सा उज्जवल, कोमल हृदय जो फूल कंवल, किलकारी चिड़िया की चहक सी, भोली
मुस्कान सहज सरल ।
बन ठन सज संवरता चल चल मानव चल बढ़ता चल ।
सरक सरक घुटनों के बल, नन्हें हाथों से कुर्सी को थाम, बाग चलने की पुरजोर कोशिश में, एकाएक गिर जाते धडाम । रो मत फिर उठ हंसता चल, चल मानव चल बढ़ता चल । कवि ने इस भाग में शिशु की जाने वाली बाल सुलभ विभिन्न चेष्टाओं का वर्णन किया । जिसमें कवि सूरदास का प्रभाव परिलिक्षत होता है ।
किशोरावस्था
ज्ञान को जगाने, आगे ही चल, स्वयं को बनाने आगे ही चल ।
नूतन हुंकार तू भरता चल, नूतन पुकार तू करता चल।
छोड़ दे अपनी जड़ता चल, चल मानव चल बढ़ता चल । बार बार क्यों बदलता मौसम बारिश, सर्दी गर्मी का मौसम । इसी बीच परीक्षाओं का मौसम, इसी के साथ त्यौहारों का मौसम ।
इन मौसम से निकलता चल, चल मानव चल बढ़ता चल । किशोरावस्था के वर्णन में कवि अकरम किशोरों से आहवान करता है कि वह आग रास्ते से हट कर अपना खुद का रास्ता बना कर उस पर चले। सभी बाधाओं को पार करने का हौसला रखने को कवि कहता है।
युवावस्था
तू नया तूफान है चलता चल, तू नया विहान है चलता चल। तू नई उड़ान है, चलता चल, तू नई मुस्कान है चलता चल । हवा का रूख मोड़ता चल, टूटी कड़ियां जोड़ता चल
कुरीतिओं को तोड़ता चल, छाप अमिट छोड़ता चल, दिखा सच्ची रचनात्मकता चल, चल मानव चल बढ़ता चल।
कविता के इस भाग में कवि युवा को तूफान बनने को प्रोत्साहित करता है। पुरानी दकियानुसी प्रथाओं को त्यागने की बात भी करता है।
कुल मिला कर यह कविता समाज को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। शब्द विन्यास अच्छा है। पढ़ने वाले को जरूर सोचने को मजबूर करेगी। कवि ने जीवन के पृथक पृथक काल खण्डों के लिये पृथक पृथक दशायें सुझाई है।
कोई सुलह करा दे जिंदगी की उलझनों से, बड़ी तलब लगी है मुस्कुराने की ।
मेरी सब से गुजारीश हैं कि इस पुस्तक को जरूर पढें। अपनी प्रतिक्रिया देवे। अकरम से अपेक्षा है कि वे अपने लेखन की धारा में निरंतरता व प्रवाह जारी रखें। क्योंकि लफ्ज जब बरसतें हैं बन कर बूंदें, मौसम कोई भी हो मन भीग जाता है। बेहतर कलमकार की देश व समाज को हमेशा आवश्यकता होती है। वैसे भी आजकल लिखने वाले कम ही हैं। मैं उनके स्वस्थ व उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।
जयंत कुमार थोरात
सेवानिवृत (आई. पी. एस.)
रायपुर छ. ग.


